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         जीवन उस आईने के समक्ष बैठ कर मैं बार-बार अपनी सफ़ेद बालों में , हड्डी और चमड़े वाले हाथों से फेरता रहा ,सहलाता रहा अपने झुर्रियों को जो चेहरे पर अब साफ नज़र आ रहे । साफ नजर आ रहा था उस आईने के सामने पड़ा मेरा अस्तित्व और आईने के पीछे की सारी जिंदगी निरंतर मैं आईने में जीवन की  निस्सारता को निहारता रहा । आईने पर पड़ रही खिड़की वाली रौशनी भौचक्का करती मेरी आँखें .......
            व्यथा कितनी अजीब थी उसकी व्यथा वो आगे निकलता था और मैं उसके पीछे- पीछे बिना सोचे, बिना समझे कि वो किस ओर जा रहा गलत है या सही निकल पड़ती थी समाज की अवहेलनाओं की परवाह किये बिना ही निकल पड़ती थी सबसे दुःखद तो यह था  कि उसने कभी पीछे मुड़कर देखा ही नहीं वो ही हमारे भावनाओं को नही समझ पा रहा था, जिसके पीछे सारी दुनिया पड़ी थी मैने इसकी भी परवाह न की  क्योंकि मेरी भी अलग ही व्यथा थी, जिसे व्यक्त करना खड़े -खड़े पहाड़ की चोटी छूना था।      गरिमा रानी भारतीय भाषा केंद्र जे एन यू

अंतिम सच

                                       तुम्हारे नाक के नीचे से                                        तुम्हारे दोनों स्तनो के उभार                                        के बीच से                                        तुम्हारे पेट के चाँद के पार                                         मनुष्य का अंतिम सच है