व्यथा कितनी अजीब थी उसकी व्यथा वो आगे निकलता था और मैं उसके पीछे- पीछे बिना सोचे, बिना समझे कि वो किस ओर जा रहा गलत है या सही निकल पड़ती थी समाज की अवहेलनाओं की परवाह किये बिना ही निकल पड़ती थी सबसे दुःखद तो यह था कि उसने कभी पीछे मुड़कर देखा ही नहीं वो ही हमारे भावनाओं को नही समझ पा रहा था, जिसके पीछे सारी दुनिया पड़ी थी मैने इसकी भी परवाह न की क्योंकि मेरी भी अलग ही व्यथा थी, जिसे व्यक्त करना खड़े -खड़े पहाड़ की चोटी छूना था। गरिमा रानी भारतीय भाषा केंद्र जे एन यू
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